18 साल से कम उम्र की लड़कियों को मोबाइल देने पर विवाद – गोरखपुर यूनिवर्सिटी में उठी बहस

By gorakhpur times

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गोरखपुर मोबाइल विवाद

गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) – डिजिटल युग में मोबाइल फोन हर किसी की ज़रूरत बन चुका है, लेकिन हाल ही में गोरखपुर यूनिवर्सिटी में हुई एक खुली चर्चा में यह सवाल उठाया गया कि क्या 18 साल से कम उम्र की लड़कियों को मोबाइल देना सही है या नहीं? इस मुद्दे पर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स, रिसर्च स्कॉलर्स और छात्राओं ने अपने विचार रखे।

मोबाइल की अहमियत पर जोर

अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर अजय शुक्ला का कहना है कि आज के समय में मोबाइल पढ़ाई, सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता के लिए बेहद ज़रूरी है।

“आज डिजिटल युग में बिना मोबाइल के काम चल ही नहीं सकता। चाहे ऑनलाइन क्लास हो, डिजिटल पेमेंट हो या रियल टाइम लोकेशन, हर जगह मोबाइल ज़रूरी है। लेकिन बच्चों के लिए पैरेंटल कंट्रोल होना बेहद ज़रूरी है,” उन्होंने कहा।

उन्होंने सुझाव दिया कि माता-पिता अपने बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नज़र रखें और मोबाइल का इस्तेमाल सिर्फ सीखने और पढ़ाई से जुड़े कामों के लिए करवाएं।

पैरेंटल कंट्रोल की मांग

कई छात्राओं ने माना कि 18 साल से कम उम्र में मोबाइल फोन दिया जा सकता है, लेकिन उसके इस्तेमाल पर सख्त निगरानी होनी चाहिए।

  • पढ़ाई या ऑनलाइन क्लासेस के समय मोबाइल दें
  • सोशल मीडिया ऐप्स को सीमित करें या हटाएँ
  • स्क्रीन टाइम को 1 घंटे तक सीमित रखें

एक छात्रा ने कहा:“मुझे लगता है कि बच्चों को फोन देना चाहिए, लेकिन पेरेंट्स को स्मार्ट होना पड़ेगा। उन्हें यह देखना होगा कि बच्चे कौन-से ऐप्स यूज़ कर रहे हैं, और पैरेंटल कंट्रोल सेटिंग्स का सही उपयोग करना होगा।”

सोशल मीडिया का दुष्प्रभाव

छात्राओं और प्रोफेसर्स दोनों ने माना कि मोबाइल के गलत उपयोग के कारण कई नकारात्मक प्रभाव सामने आए हैं।

  • गेमिंग की लत
  • सोशल मीडिया पर ज़रूरत से ज़्यादा समय बिताना
  • गलत कंटेंट तक पहुंच
  • मानसिक स्वास्थ्य और आंखों पर बुरा असर

एक रिसर्च स्कॉलर ने कहा:

“आज इंस्टाग्राम, रील्स और शॉर्ट वीडियो ने बच्चों का ध्यान पढ़ाई से हटाना शुरू कर दिया है। पैरेंट्स को इस पर तुरंत नियंत्रण करना होगा।”

लड़के-लड़कियों में समानता की मांग

चर्चा के दौरान कई लोगों ने कहा कि सिर्फ लड़कियों के लिए मोबाइल पर रोक लगाना जेंडर डिस्क्रिमिनेशन है।

“अगर मोबाइल पर कंट्रोल चाहिए, तो वह सभी बच्चों पर होना चाहिए, चाहे वे लड़के हों या लड़कियां। गलत कंटेंट या दुष्प्रभाव का असर दोनों पर समान रूप से पड़ता है,” एक छात्रा ने कहा।

डिजिटल युग में बदलाव की ज़रूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि अब समाज को बदलते समय के हिसाब से चलना होगा।

  • बच्चों को डिजिटल लिटरेसी सिखाई जाए।
  • मोबाइल के सुरक्षित उपयोग के लिए ट्रेनिंग दी जाए।
  • माता-पिता को भी नई तकनीक की जानकारी दी जाए ताकि वे बच्चों की गतिविधियों की निगरानी कर सकें।

सरकार की पहल

चर्चा में छात्रों ने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मुफ्त टैबलेट और मोबाइल फोन भी दिए गए हैं। इन डिवाइसेज़ में पैरेंटल कंट्रोल पहले से एक्टिवेट किया जाता है, ताकि बच्चे किसी गलत साइट या कंटेंट तक न पहुंच सकें।

निष्कर्ष

गोरखपुर यूनिवर्सिटी की इस चर्चा से साफ है कि:

  • मोबाइल फोन को पूरी तरह बैन करना सही समाधान नहीं है।
  • बच्चों को डिजिटल युग के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए मोबाइल की जरूरत है।
  • पैरेंटल कंट्रोल, सीमित स्क्रीन टाइम और निगरानी के साथ ही मोबाइल का सुरक्षित उपयोग संभव है।

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